Wednesday, July 29, 2009

आज की महिला

औद्योगिक क्रान्ति के इस युग में आप किसी भी बाजार से गुजर जाइए, लोगों की अपार भीड आपको नजर आएगी। दुकानों पर लोग महंगे से महंगे कपडे, सजावट की चीजें या फिर लेन-देन के लिये उपहार खरीदते नजर आएंगे। सवाल ये है कि इतनी सारी चीजों को क्या लोग एक साथ इस्तेमाल कर पाते हैं? खासतौर पर महिलाएं जो हमेशा से हर घर का बचत बैंक रही हैं, लेकिन आजकल यही महिलाएं हर सीजन में बाजार में ताबडतोड ख़रीददारी करती नजर आ रही हैं। चौंकिये नहीं और न ही चिंतित होइए क्योंकि यह आश्चर्यजनक बदलाव सिर्फ महिलाओं में अपनी कमाई के बूते पर ही नहीं आ रहा है, बल्कि वैज्ञानिकों की बात मानें तो इसके लिय उनके शरीर में बाजार, दुकान और सामान को देख कर होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाएं और इम्पल्सेज भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं।


वैज्ञानिकों का यह दल अमेरिका के हावर्ड बिजनेस स्कूल में उपभोक्ताओं की आदतों और बाजार में इनके शारीरिक और मानसिक स्थिति का अध्ययन कर रहा है। और इस दल को चूंकि कोकाकोला, प्रोक्टर एंड गैम्बल और जनरल मोटर्स जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने स्पॉन्सर किया है इसलिये इनके निष्कर्षों को लोगों का ब्रेनवाश करने की मुहिम भी करार दिया जा रहा है। मगर इस टीम के अध्ययन ने यह स्पष्ट निष्कर्ष निकाला है कि बाज़ार में महिलाओं और एक हद तक पुरूषों के मस्तिष्क में तेज रासायनिक प्रतिक्रिया होती है जिससे उनके मन में खरीददारी करने की तरंगे यानि इम्पल्स उत्पन्न होती हैं। वह बात अलग है कि महिलाओं को अलग चीजें आकर्षित करती हैं, पुरूषों को अलग।
इतना ही नहीं इस अध्ययन ने हर चीज देख-परख कर किफायत के साथ खरीदने की पारंपरिक मान्यता को भी चुनौती दे दी है। क्योंकि इन वैज्ञानिकों के मुताबिक महिलाएं किसी भी सामान को खरीदने का फैसला एक रौ में बह कर यानि अवचेतन मन से करती हैं। इस अध्ययन के मुताबिक खरीददार को जब बाजार में कोई चीज लुभा लेती है तो वो तमाम सिध्दांत भूल कर उसकी उपयोगिता आंके बिना उसे खरीद बैठता है। इसकी वजह दिमाग में बेसाख्ता उठने वाली वो ही तरंगे जिनके थमने पर उपभोक्ता खुद भी अपनी हरकत पर ताज्जुब या पश्चाताप करते हैं। और इसे ही इम्पल्सिव शॉपिंग कहते हैं।


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